कुछ ख्वाइशें

कुछ ख्वाइशें करली मैंने उस ख़ुदा से यूँ,
वो पूछने पे मुझसे मजबूर हो गया,
क्या चाहता है आज मुझसे यूं आज इस तरह,
पहले तो ना देखा तुझको मैंने इस जगह,

मैं मंदिर ना गया था कभी , ना देखि कोई मस्जिद,
आज भी मांगा नहीं कुछ बस की एक छोटी सी जिद्द,
वो देख करके मुझे कुछ यूं बोलने लगा,
आज कहाँ है तेरा रुतबा जो कल तक था खड़ा,
मैं झूख गया नजरो तक उसके सजदे में,
वो बोला आज क्यों है विश्वास मेरे फ़रिश्ते में,
मैं बोला था गुरूर मुझको अपने पे इतना यूं,
कैसे आता पास तेरे सर को झुकाके यूं,

हसके देखने लगा वो हालात पे मेरी,
बोला जशन है तेरा, क्या जरुरत तुझे मेरी,
मैं फिर भी बोला सुनले तू एक दफा मेरी,
दे दे मुझे ग़ुरबत जो चाहत में है मेरी,

बूढ़ा हुआ हू अब में और क्या चाहता है तू,
लेना है तो जान ले मेरी , ऐसे सताता है क्यों,
मुड़ के देख तो एक बार तुझे कहता हू गिरधारी,
तुच्छ से मनुष्य को पीठ दिखाता है क्यों,

वो हसके बोला मुझसे ये कहाँ है मेरा काम,
तेरा करम है, तेरा दोष है, अब क्यों तू है हैरान,
जा चला जा लौट कुछ आखरी पल है उसके पास,

क्यों इंतजार में यहाँ खुदको रुलाता है क्यों |

Comments

  1. It is like a poetry carrying u to ur dreams amidst the stars

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    1. :) such high praise from dikra.. Thank you..

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  2. This poem lead me where I believe you wanted me to go!
    Vivid impression left Sir.

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