याद है तुझको वो बचपन?

फ़व्वारा याद है बचपन का जो पानी बाहर फेंकता था,
पल याद है महफ़िल का जब हर कोई तुमसे मिलता था,
याद बहूत है उस याद की जब कोई ऐसा कहता था,
कि बचपन में तू हस्ता हुआ मेरे पास ही रहता था,

याद है तुझको वो खेत झोड़ पर जहाँ पानी गहरा था,
वो रेत की खुशबू के आगे तेरा मन भी ठहरा था,
वो फूल भी कुछ कहते थे, उनमें तीतर भी रहते थे,
वो हवा भी यूं महकी थी, जहाँ नानी माँ रहती थी,
कुछ यादें तो ऐसी है जो बस तेरे साथ ही रहती है,
इनमें तू खो जाता है, हस्ते हस्ते रो जाता है,
इन खट्टी मीठी बातों में एक अजब सा सार है,
इनमें यादों की डोर से लिपटी एक अचल धार है,

रातों की बातों में एक कहानी ऐसी भी तो होती थी,
जिसको सुनके छोटी बहन थोड़ा सा तो रोती थी,
मज्ज़ा बहुत था इन सब में, क्या जानेगा आज कोई,
लगता था डर जब छत पर सोता नहीं था साथ कोई,

जब सूरज की किरणों से नींद खुला करती थी,
जब धूप की ताप से चिड़िया बचा करती थी,
जब फ़ोनों पे बातों के लिए लाइन लगा करती थी,
तब हम उठते थे आख़िर में और डांट पड़ा करती थी,

क्या जानेगा आज कोई वो तेरे मेरे बचपन को,
हस लेंगे जब याद करेंगे मिलके अपने कुछ पल वो,
जहाँ पक्षी की चहक पे मुस्कुराया जाता था,
जहाँ रसोई की टोकरी से आम चुराया जाता था..

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