मैं नहीं जानता

मैं नहीं जानता, मैं नहीं जानता,

ना जाने क्या बात थी वो,
ना जाने क्या रात थी वो,
कुछ हस्सी के फुहारे थे,
कुछ दिलों में तराने थे,

कई बात थी दिलों में,
कुछ कशिश थी महफिलों में,
कुछ ठहाके भी थे,
इन आँखों के पास आंसू छलकाने के बहाने भी थे,

कहीं जाम भी छलके थे,
कहीं  लोग भी बहके थे,
कहीं सन्नाटा भी था,
कहीं वो दोस्ती वाला गाना भी था,

कैसे होते है ना दोस्त? कुछ पल मिलके साथ चलके ज़िन्दगी जीने लगते हैं,
पागल होते हैं शायद, पागल ही तो होते हैं जो भूल जाते हैं  कि कभी बिछड़ना भी होगा,
आँखों में ख्वाब सजाते हैं, हर दिल को अपना बनाते हैं और कुछ बोले बिना कितना बोल जाते हैं,
बहस भी तो करते हैं, रूठ भी जाया करते हैं, नाराज़ तो इस कदर होते हैं मानो दुनिया चीन ली हो,
फिर वो एक गल्ले से मिल जाने पे ऐसा क्या होता है कि सब दर्द दूर हो जाता है,
सब अच्छा लगने लगता है,


मैं नहीं जानता , मैं नहीं जानता पर अब ये दिल नहीं मानता |

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