खोई ज़िन्दगी

सूरज में रह कर ही छाँव का महत्व नजर आता है,
गिरने से ही उठने का सबब समझ आता है,
आसमान तो ऊँचा है ही पर कद तो गुरूर का भी लम्बा नज़र आता है,
क्या ढूंढ रहे हो इस चकाचौंध में? वो पल सुकून के जिसके लिए ज़िन्दगी भर मर रहे हो,

जूता फैंकने से खाई की गहरायी तो पता लगा लोगे , अंदर की गहरायी तो अब मापी भी नहीं जाती,
सांस रुकने लगी है लोगों की अब अंधड उम्र में फिर क्यों नहीं कुछ कर रहे हो?
क्या है उस चमचमाती गाड़ी में जिसके लिए अपने आप को बेच रहे हो?
पहुँच भी पाओगे वहाँ ये सोच के चल रहे हो? या गुज़र के उस मुकाम से भी आगे दौड़ते रहना है?

रुकता कोई नहीं है यहॉं पे, जब सोच नहीं रुकी तो तुम क्या रुकोगे,
पर मंजर पता हो तो दौड़ने में मजा भी है,
वरना इस दौड़ में खुशिया कहीं पीछे छूट जाती है और न जाने कब जीत कर भी हार जाते हैं लोग |

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