इंसान
कहानी कुछ शुरू हुई,
कहानी कुछ बाकी है,
कश्ती कुछ पार हुई,
कुछ के समंदर अब साथी है,
जब दिल की बात पूरी हुई,
तब मन में कुछ बाकी है,
जब रास्ता सब साफ हुआ,
नजरे अब जरा आधी है,
हर कागज़ की किस्मत में सियाही नहीं,
कुछ सड़कों पे आज भी कोई राही नहीं,
पहाड़ों से दिखता था जो घर,
अब उसमें रहने वाला वो सिपाही ही नहीं,
कुछ गहराई मे अक्सर खो जाता हूं,
मिल गया हूं खुदको ये समझाता हूं,
जमाने मे उल्झा जाता हूं,
तभी तो इंसान कहलाता हूं |

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