दास्तान

अक्सर किनारों और चौराहों पर,

थम सा जाता हूं कुछ राहों पर,

ना शब्द ना ख्याल कुछ आता है,

बस नज़र जाती है कुछ सितारों पर,


सफर में अड़चन हुई कई दोर,

कुछ संभली कुछ बस अंदर का शोर,

इस जमाने पे कहा किसी का जोर,

अब तो बस चलते रहना है कहके थोड़ा ओर,


ना नक्शा ने कोई रास्ता पता है,

जब किस्सा हो लंबा तो कोई सुनता कहा है,

हर तरफ एक धुंदली आंधी चलती है,

तूफान के आगे कहा आग सुलगती है,


कुछ रास्ते भी तो खराब होते हें साहब,

जिनपर चलकर ही समझ आता है,

अगर अंदर सब अँधेरा हो,

तो कहा सवेरा भी रोशनी लाता है,


जब मंजिल नजर आती है,

तभी तो राहें जगमगाती है,

कभी उनसे भी तो पूछा जाए,

जिन्की नज़रें देख नहीं पाती है,


कभी लोग तो कभी सफर सिखाता है,

जब खुद हो नाकाम तो वक्त सब दिखाता है,

बस याद रहे हमेशा भरोसा रहे खुद पर,

इस सफ़रनाम-ए-जीवन में हररोज कोई आता और जाता है...




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