बादल गलाने के अरमान थे
बादल गलाने के अरमान थे,
आतिशें दीवारों पे फरमान थे,
आग भी थी नशा भी था,
उस रोज आसमान कुछ ठहरा भी था,
कश्मकश में जला या क़ुर्बत में,
तभाही का आलम मिला मुझे इस जग में,
अब कुर्फत से होगा भी क्या सोचा मैंने,
जो तबियत से मिला वो खो दिया तूने,
मैख़ाने में जब मैं अकेला हुआ,
तब जाना अपनों को रूठे जमाना हुआ,
हर तरफ मार का ऐसा तांडव हुआ,
आँखों की दशा सावन का आँगन हुआ,
पर्वतों में राख बिछ सी गयी,
बर्फ का कालीन भी तो काला हुआ,
“मेरा बहकना उस महफ़िल में हर मुँह की हस्सी का बहाना हुआ,
मैंने सोचा क्या कहना अब जब पर्वत पे मेरा ठिकाना हुआ”
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