चाहत -> परिंदा आसमान का

कश्मकश की लॉ में जलना नहीं है ज़िन्दगी,
हर चाह को पूरा करना नहीं है ज़िन्दगी,
आँखों की तलाश कहाँ मंज़िलों पे रूकती है,
पर हर सपने को मंजिल बनाना नहीं है ज़िन्दगी,

चाहत का कोई रूप नहीं है सोचें तो,
वो पानी है ,बर्तन का आकार तुम उसे देते हो,
सागर की लहर का कोई किनारा तो होता है,
उसके पास रेत का सहारा तो होता है,
वरना ख्वाइशों के बंगले कितनो के गिरे है,
अब तो गिनने वाले भी कम ही बचे है,

ख़ुशी घरों में होती है, मकान अक्सर ढह जाते है,
अहंकार की सीमेंट में रिश्ते पता नहीं कहाँ रेह जाते है,
पीछे मुड़ने पे कुछ समझ नहीं आता,
ऐसे ही चलता है ये घड़ी का काँटा,

हर दोष परवरिश का नहीं होता,
ज़िन्दगी तुमने भी अपने हिसाब से जी है,
ढूंढो अपने ही आप में कुछ,
वहीं पर हर चीज छुपी है,




 बस अंत में इतना कहूंगा -
" ख़ुशी ना मंदिर में है ना मस्जिद में , ना अज़ान में है ना महफ़िल में ,
   एक परिंदा है खुले आसमान का, ढूंढो तबियत से उसे अपने ही दिल में  "

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