नहीं
लाख छिपाने से दुःख नहीं छुपता है,
पर हर दुःख छिपाने के लायक तो नहीं,
है हिम्मत तो लड़ उस ताकत से,
यूं झुक जाने में राहत तो नहीं,
हर बात पे दम निकलता है,
हर चीज से तू क्यों डरता है,
है कशिश तो पाले उस मंज़िल को यूं,
थक कर रुक जाने मैं साहस तो नहीं,
बन मजबूत तू ऐसा की देखे जब बलवान तो सोचे की आज कोई बगावत नहीं,
करे गलत गर हितैषी भी तेरा तो रख उसमे कोई आहत नहीं,
तू आग है , ये हवा तुझे कहा रोक पायेगी,
जल जाएगी वो नजर जो तुझसे नजर लड़ाएगी,
रख तेज तू ऐसा की सूरज भी सोचे आज शाम कब आएगी,
दे चुनौती उस पर्वत को , फिर ये धरती खुद तेरी राह बनाएगी,
अरे तारीफ के काबिल तो वो तानसेन था, पर सभा की रौनक की चाहत में नहीं,
करना है तो कर कुछ अपने लिए, संसार को तेरी आहट नहीं,
पाने को है सैलाब पूरा , तू रुक नहीं ,तू झुक नहीं,
कल पूरब से पश्चिम देखेगा तुझे ,तू किसी से कम नहीं, तू किसी से कम नहीं...
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